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यह सावन सिर्फ सावन नहीं था… मैंने अपनी आँखों से देखा, जब भक्ति तपस्या बन जाती है: शान्तनु शुक्ला

आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी कैलाशानंद गिरि जी महाराज की साधना को करीब से देखने और उसे देश-दुनिया तक पहुंचाने को शान्तनु शुक्ला ने बताया जीवन का बड़ा सौभाग्य

प्रयागराज/हरिद्वार। सावन का महीना भगवान शिव की आराधना, साधना और भक्ति का पर्व माना जाता है, लेकिन इस बार की सावन साधना ने अनेक श्रद्धालुओं के मन पर अपनी अलग छाप छोड़ी। आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी कैलाशानंद गिरि जी महाराज की कठिन साधना, निरंतर पूजा, रुद्राभिषेक और महादेव के प्रति उनका समर्पण देश-दुनिया के करोड़ों श्रद्धालुओं तक पहुंचा।

गुरुदेव की इस साधना को बेहद करीब से देखने वाले अंतर्राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी शान्तनु शुक्ला कहते हैं कि इस एक महीने ने उन्हें सेवा, साधना और समर्पण का एक ऐसा अर्थ समझाया, जिसे शब्दों में पूरी तरह व्यक्त करना कठिन है। शान्तनु शुक्ला के अनुसार, “यह सावन सिर्फ सावन नहीं था। मैंने अपनी आंखों से देखा कि जब भक्ति अपने चरम पर पहुंचती है तो भूख-प्यास, थकान और शरीर की पीड़ा भी छोटी लगने लगती है।”

उन्होंने कहा कि पूज्य गुरुदेव आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी कैलाशानंद गिरि जी महाराज के सामने पूरे सावन में केवल एक लक्ष्य दिखाई देता था—अपने आराध्य भगवान महादेव की सेवा। घंटों की साधना, कठिन तपस्या, निरंतर पूजा और रुद्राभिषेक के बीच शरीर को होने वाली पीड़ा भी उनकी साधना को रोक नहीं सकी। शान्तनु शुक्ला बताते हैं कि उन्होंने इस दौरान गुरुदेव के चेहरे पर शिकायत के बजाय साधना का भाव और मन में केवल महादेव के प्रति समर्पण देखा।

करोड़ों लोगों तक पहुंची गुरुदेव की साधना

स्वामी कैलाशानंद गिरि जी महाराज की सावन साधना सोशल मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म, समाचार चैनलों और समाचार पत्रों के माध्यम से देश-दुनिया के करोड़ों लोगों तक पहुंची। दूर-दूर बैठे श्रद्धालु घंटों गुरुदेव की साधना के दर्शन करते रहे।
शान्तनु शुक्ला के मुताबिक, इस दौरान अनेक लोगों ने उनसे संपर्क कर अपनी भावनाएं साझा कीं। कई श्रद्धालुओं ने कहा कि उन्होंने ऐसी साधना पहले कभी नहीं देखी।
वे कहते हैं कि लोगों के मन में स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठता था कि आखिर इतनी कठिन साधना संभव कैसे है। लेकिन गुरुदेव के करीब रहकर इस साधना को देखने वालों के लिए इसका उत्तर किसी एक शब्द में नहीं, बल्कि समर्पण में दिखाई देता है।

मैं रुद्राभिषेक नहीं कर पाया, शायद गुरुदेव ने मेरे लिए कुछ और तय किया था

सावन के दौरान शान्तनु शुक्ला की भी इच्छा थी कि वे भक्त के रूप में गुरुदेव की साधना में बैठें, रुद्राभिषेक करें और भगवान शिव के चरणों में अपनी आस्था अर्पित करें।
हालांकि, परिस्थितियों के कारण वे रुद्राभिषेक नहीं कर सके। शुरुआत में उन्हें इसका मलाल भी रहा, लेकिन जैसे-जैसे सावन आगे बढ़ा, उन्हें महसूस हुआ कि शायद गुरुदेव ने उनके लिए कोई दूसरी सेवा निर्धारित कर रखी थी। उनके अनुसार, “मैं रुद्राभिषेक नहीं कर पाया, लेकिन शायद गुरुदेव ने मेरे लिए किसी और रुद्राभिषेक की जिम्मेदारी तय कर दी थी। वह रुद्राभिषेक जल से नहीं, सूचनाओं और भावनाओं से था।

गुरुदेव की साधना को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाना, श्रद्धालुओं को उनके दर्शन कराना और उनकी तपस्या से लोगों को जोड़ना ही इस दौरान उनकी प्राथमिकता बन गई। कभी कैमरे के पीछे, कभी मीडिया के बीच और कभी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर—शान्तनु शुक्ला लगातार गुरुदेव की साधना से जुड़ी जानकारी और दृश्य लोगों तक पहुंचाते रहे।

वे इस पूरे अनुभव को एक ही भाव से देखते हैं—

“गुरुदेव, यह मैं नहीं कर रहा था… आप मुझसे करवा रहे थे।”

“शायद मेरा रुद्राभिषेक यही था”

सावन के समापन पर पीछे मुड़कर देखते हुए शान्तनु शुक्ला कहते हैं कि भले ही वे शिवलिंग पर जल अर्पित नहीं कर पाए, लेकिन गुरुदेव की साधना का संदेश लाखों-करोड़ों लोगों तक पहुंचाने का अवसर उन्हें मिला। सैकड़ों श्रद्धालु गुरुदेव के दर्शन और आशीर्वाद से जुड़े। अनेक लोगों ने पहली बार उनकी साधना को देखा और उससे प्रभावित हुए।

शान्तनु शुक्ला के लिए यही उनकी सेवा का सबसे बड़ा संतोष रहा। वे कहते हैं कि “शायद महादेव ने मुझे शिवलिंग पर जल चढ़ाने के बजाय गुरुदेव की साधना को लोगों के हृदय तक पहुंचाने का माध्यम बनाया था।”

एक महीने ने बदल दिया सेवा और समर्पण का अर्थ

शान्तनु शुक्ला के मुताबिक, इस एक महीने ने उन्हें यह समझाया कि गुरु की सेवा हमेशा वही नहीं होती, जो शिष्य स्वयं करना चाहता है। कई बार गुरु शिष्य को वह जिम्मेदारी देते हैं, जिसके बारे में उसने स्वयं कभी सोचा भी नहीं होता।
उनके शब्दों में, “हम समझते हैं कि हम गुरु के लिए कुछ कर रहे हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि गुरु हमसे अपना काम करवा रहे होते हैं।”

वे कहते हैं कि इस सावन की उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि किसी संख्या, प्रचार या व्यक्तिगत उपलब्धि में नहीं है। उनके लिए सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि वे गुरुदेव की साधना के संदेश को लोगों तक पहुंचाने का एक छोटा सा माध्यम बन सके।

“गुरुदेव की महानता केवल देखी नहीं, महसूस की है”

शान्तनु शुक्ला कहते हैं कि किसी संत की महानता केवल मंच से दिए गए प्रवचनों से नहीं समझी जा सकती। उसे समझने के लिए उसके साथ समय बिताना, उसकी साधना को करीब से देखना और कठिन परिस्थितियों में उसके समर्पण को महसूस करना पड़ता है।

उन्होंने कहा कि इस सावन में उन्होंने एक ऐसे साधक को देखा, जो अपने आराध्य के सामने स्वयं को पूरी तरह समर्पित कर देता है। “गुरुदेव को देखकर बार-बार यही लगा कि जब भक्ति सच्ची होती है तो शरीर पीछे छूट जाता है और केवल आत्मा अपने आराध्य के साथ रह जाती है।”

सावन विदा हुआ, लेकिन साधना की स्मृतियां हमेशा रहेंगी

सावन का महीना भले ही विदा हो रहा हो, लेकिन शान्तनु शुक्ला के लिए इस एक महीने की यात्रा कभी समाप्त नहीं होगी। उनके पास गुरुदेव की साधना के अनगिनत दृश्य, श्रद्धालुओं की आंखों में दिखाई देने वाली आस्था और महादेव के प्रति गुरुदेव के समर्पण की स्मृतियां हैं।

वे कहते हैं कि उन्हें नहीं पता कि इस सावन में उन्होंने क्या पाया, लेकिन इतना जरूर महसूस करते हैं कि वे सावन के पहले दिन जैसे थे, सावन के बाद वैसे नहीं रहे। “मेरे भीतर सेवा का अर्थ बदल गया है, श्रद्धा का अर्थ बदल गया है और गुरु के प्रति समर्पण का अर्थ भी बदल गया है।”

सावन के समापन पर गुरुदेव के प्रति अपनी भावनाएं व्यक्त करते हुए शान्तनु शुक्ला कहते हैं—“गुरुदेव, मैं रुद्राभिषेक नहीं कर पाया, लेकिन आपने मुझे अपनी साधना का संदेश दुनिया तक पहुंचाने की सेवा दी। मेरे लिए यही मेरा रुद्राभिषेक था, यही मेरी साधना थी और यही मेरे जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य है।”

उन्होंने कहा कि सावन में उन्होंने जो कुछ किया, वह उनका अपना नहीं था, बल्कि गुरुदेव की प्रेरणा, कृपा और आशीर्वाद था। “मैं तो केवल एक माध्यम था। अगर जीवन में कभी कोई मुझसे पूछे कि इस सावन में तुम्हें सबसे बड़ी उपलब्धि क्या मिली, तो मेरा उत्तर होगा—मैंने महादेव की साधना करते अपने गुरुदेव को देखा और उनकी सेवा करने का सौभाग्य पाया। इससे बड़ा सौभाग्य मेरे लिए और कुछ नहीं।”
हर हर महादेव।
जय गुरुदेव।

शान्तनु शुक्ला
अंतर्राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी

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