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सावन में जलाभिषेक क्यों है विशेष? शिवपुराण से जानिए भगवान शिव की प्रिय पूजा विधि

लेखक : डॉ. जयशंकर प्रसाद शुक्ल

(वरिष्ठ पत्रकार)

लखनऊ। पूरे विश्व में भारत एक ऐसा देश है जहां संस्कृति और संस्कृत का विशेष महत्व है। देवों के देव महादेव शिव का प्रिय श्रावण मास भारतीय आस्था, अध्यात्म और सनातन परंपरा का प्रतीक माना जाता है। भारत में भगवान शिव को सर्वव्यापी, परम कल्याणकारी और सृष्टि के आधार के रूप में पूजा जाता है। आधुनिक विज्ञान भी अंतरिक्ष में मौजूद अदृश्य ऊर्जा और डार्क मैटर के अस्तित्व पर शोध कर रहा है। ऐसे में शिव के स्वरूप और उनकी विशेषताओं पर और गहन अध्ययन की संभावनाएं दिखाई देती हैं। हम सभी भारतीय स्वयं को सौभाग्यशाली मानते हैं कि हमारा जन्म उस पवित्र भूमि पर हुआ, जिसे ऋषि-मुनियों की तपोभूमि कहा जाता है। माता-पिता के संस्कार और हमारी प्राचीन संस्कृति हमें जीवन के उच्च मूल्यों से जोड़ते हैं, जिनका सर्वोच्च स्वरूप भगवान शिव में दिखाई देता है।

पूर्णिमा के दिन श्रवण नक्षत्र के योग के कारण इस मास को श्रावण कहा जाता है। मान्यता है कि यह संपूर्ण जगत भगवान शिव की ही सृष्टि है और “शिव” का अर्थ ही परम कल्याणकारी होता है। भगवान शिव देवों में महादेव हैं, जो सृष्टि के लय और प्रलय के स्वामी हैं। उनके स्वरूप में अद्भुत संतुलन दिखाई देता है। मस्तक पर चंद्रमा, गले में नागराज, अर्धनारीश्वर रूप और कामजित स्वरूप—ये सभी उनकी दिव्यता और व्यापकता का प्रतीक हैं।

यद्यपि सोमवार का दिन भगवान शिव की उपासना के लिए अत्यंत शुभ माना गया है, लेकिन सावन मास का प्रत्येक सोमवार विशेष महत्व रखता है। इसी कारण इस पूरे माह में भगवान शिव का जलाभिषेक, रुद्राभिषेक और विशेष पूजन किया जाता है। शिव और रुद्र एक-दूसरे के पर्याय हैं। शास्त्रों के अनुसार रुद्राभिषेक और रुद्रार्चन से साधक के पाप, पातक और महापातक तक नष्ट हो जाते हैं तथा उसमें शिव तत्व का उदय होता है। ऐसा भी कहा गया है कि भगवान सदाशिव की पूजा करने से सभी देवताओं की पूजा का फल स्वतः प्राप्त हो जाता है, क्योंकि सभी देवताओं की आत्मा में रुद्र का ही वास है।

धार्मिक ग्रंथों में विभिन्न कामनाओं की पूर्ति के लिए रुद्राभिषेक की अनेक विधियां और पूजन सामग्री का उल्लेख मिलता है। श्रद्धालु अपनी मनोकामना के अनुसार विभिन्न मुहूर्तों में विशेष विधि से भगवान शिव का अभिषेक करते हैं। श्रावण मास में भोलेनाथ की आराधना से वातावरण शिवमय हो उठता है। इस माह में श्रद्धा और निष्काम भाव से की गई पूजा विशेष फलदायी मानी गई है। केवल बिल्वपत्र और जल अर्पित करने मात्र से भी भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होने की मान्यता है। शास्त्रों में श्रावण मास के पूरे 30 दिन जप, तप, व्रत,दान और पुण्य कार्यों के लिए अत्यंत शुभ बताए गए हैं।

पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान शिव ने स्वयं सनत कुमारों को बताया था कि उन्हें बारह महीनों में श्रावण मास सबसे अधिक प्रिय है। इसका कारण देवी सती और माता पार्वती की तपस्या से जुड़ा है। देवी सती ने अपने अगले जन्म में भी भगवान शिव को पति रूप में पाने का संकल्प लिया था। पार्वती के रूप में जन्म लेकर उन्होंने कठोर तपस्या की और अंततः भगवान शिव को प्रसन्न कर उनसे विवाह किया। तभी से श्रावण मास भगवान शिव को विशेष प्रिय माना जाता है।

इसी प्रकार ऋषि मार्कंडेय ने भी दीर्घायु प्राप्त करने के लिए श्रावण मास में कठोर तप कर भगवान शिव को प्रसन्न किया था। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें ऐसा वरदान दिया कि स्वयं यमराज भी उनके सामने नतमस्तक हो गए। समुद्र मंथन की कथा भी श्रावण मास से जुड़ी हुई मानी जाती है। जब हलाहल विष निकला, तब भगवान शिव ने उसे अपने कंठ में धारण कर संपूर्ण सृष्टि की रक्षा की। विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला पड़ गया और वे नीलकंठ कहलाए। मान्यता है कि विष की तीव्रता को कम करने के लिए देवताओं ने भगवान शिव का जलाभिषेक किया था। इसी कारण सावन में जल चढ़ाने की परंपरा विशेष महत्व रखती है।

श्रावण मास में “ॐ गं गणपतये नमः”, “ॐ नमः शिवाय”, “श्री शिवाय नमस्तुभ्यम”, साम्ब सदाशिव गायत्री मंत्र, महामृत्युंजय मंत्र, शतरुद्रसंहिता, पुरुष सूक्त तथा पंचाक्षर मंत्र का जप अत्यंत शुभ और फलदायी माना गया है। शिवपुराण में उल्लेख मिलता है कि भगवान शिव स्वयं जलस्वरूप हैं, इसलिए जलाभिषेक उनकी सर्वोत्तम उपासना मानी गई है। इस पूरे माह में जो भक्त निष्काम भाव से भगवान शिव की आराधना करता है, उस पर भोलेनाथ की असीम कृपा बनी रहती है और उसके जीवन के समस्त कष्ट दूर होकर सुख, शांति और कल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है।

 

 

 

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