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तेल की कीमतें 111 डॉलर प्रति बैरल के पार, ईरान तनाव से एशियाई शेयर बाजारों में भारी गिरावट

एशिया के शेयर बाजारों में गुरुवार को तेज गिरावट देखने को मिली। इसकी बड़ी वजह अमेरिका में कच्चे तेल की कीमतों में जबरदस्त उछाल और ईरान से जुड़ा बढ़ता तनाव है। इससे पहले बुधवार को अमेरिकी शेयर बाजार वॉल स्ट्रीट में भी भारी गिरावट दर्ज की गई थी, जिसका असर एशियाई बाजारों पर साफ दिखाई दिया।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत 111.51 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई, जो एक ही दिन में 3.9 प्रतिशत की बढ़त है। वहीं अमेरिकी क्रूड ऑयल 95.97 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया। प्राकृतिक गैस की कीमतों में भी 4.6 प्रतिशत का उछाल आया है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर तेल और गैस की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहीं, तो वैश्विक स्तर पर महंगाई तेजी से बढ़ सकती है।

मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के चलते फारस की खाड़ी में तेल और गैस की सप्लाई प्रभावित हो रही है। ईरान की सरकारी मीडिया ने कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के ऊर्जा ठिकानों पर संभावित हमलों की चेतावनी दी है। यह तनाव साउथ पार्स गैस फील्ड पर हुए हमले के बाद और बढ़ गया है।

अमेरिका में पहले से ही महंगाई का दबाव बना हुआ है। हालिया रिपोर्ट के अनुसार थोक महंगाई दर 3.4 प्रतिशत तक पहुंच गई है। फेडरल रिजर्व के चेयरमैन जेरोम पॉवेल ने कहा कि तेल की कीमतों और टैरिफ के प्रभाव को लेकर स्थिति अभी स्पष्ट नहीं है। इसी कारण फेड ने ब्याज दरों में कटौती नहीं की, जिससे निवेशकों की उम्मीदों को झटका लगा। इसके चलते डॉलर मजबूत हुआ और अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में भी बढ़ोतरी हुई। एशियाई बाजारों की बात करें तो जापान का निक्केई 225 इंडेक्स 2.5 प्रतिशत गिरकर 53,875 पर आ गया। दक्षिण कोरिया का कोस्पी 1.3 प्रतिशत नीचे रहा। हांगकांग का हैंग सेंग 0.2 प्रतिशत और चीन का शंघाई कंपोजिट 0.9 प्रतिशत गिरा। ऑस्ट्रेलिया और ताइवान के बाजार भी नुकसान में रहे।

जापान के केंद्रीय बैंक ने ब्याज दर 0.75 प्रतिशत पर बरकरार रखी है। बैंक का कहना है कि मध्य पूर्व के तनाव और महंगे तेल के कारण बाजार में अस्थिरता बनी हुई है। चूंकि जापान अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है, इसलिए बढ़ती कीमतें उसके लिए चिंता का विषय हैं। विशेषज्ञों के अनुसार महंगा तेल, मजबूत डॉलर और बढ़ती अमेरिकी बॉन्ड यील्ड एशियाई बाजारों और मुद्राओं पर दबाव बना रहे हैं, जिससे निवेशकों का भरोसा कमजोर हुआ है।

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