‘संविधान हत्या दिवस’ पर छिड़ी बहस, क्या अनुच्छेद 352 के खिलाफ है मोदी सरकार का फैसला?

डॉ. जयशंकर प्रसाद शुक्ल
(पत्रकार)
क्या ‘संविधान हत्या दिवस’ की घोषणा असंवैधानिक नही है?
…जब भारत देश में *आपातकाल लगाना संविधान के अनुरूप अनुच्छेद 352 में अंकित है। तो फिर प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी ने 25 जून 1975 को लगे आपातकाल को याद करने के वास्ते, प्रतिवर्ष *25 जून को “संविधान हत्या दिवस” कैसे घोषित कर दिया?* क्या यह सही नही है कि *ऐसी घोषणा करके प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी संविधान के अनुच्छेद 352 की हत्या ख़ुद कर रहे हैं?
*खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे*
उक्त यह कहावत प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी पर बहुत ही सटीक बैठती है क्योंकि लोकसभा चुनाव 2024 में राहुल गांधी और विपक्षी पार्टियों ने संविधान की दुहाई दिया था। जिससे कि गत लोकसभा चुनाव में एनडीए को करारी हार का मुंह देखना पड़ा था। प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी को वह दृश्य आज भी नहीं भूलता है। जो राहुल गांधी बात-बात में संविधान की कॉपी अपने हाथ में दिखाते हैं। मोदी कुछ जगह भाषणों में इसका जिक्र भी करते हैं कि कुछ लोग संविधान की दुहाई देते हैं तभी से प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी के दिमाग में आपातकाल की याद आई और उन्होंने इसे आपातकाल दिवस 25 जून 1975 को संविधान हत्या दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया।
वर्ष 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी के नेतृत्व में बनी केंद्र की एनडीए सरकार ने 25 जून 1975 की तारीख के सुखे घाव को हरा करते हुए संविधान हत्या दिवस की आधिकारिक रूप से घोषणा की। जबकि संविधान की कभी भी हत्या नहीं हो सकती है और मोदी ने 25 जून को हत्या दिवस मनाने का संकल्प लिया है। जबकि *नरेंद्र दामोदरदास मोदी ने इसी भारतीय संविधान की शपथ लेते हुए गुजरात प्रदेश के तीन बार विधायक व मुख्यमंत्री बने और गत तीन बार से देश के प्रधानमंत्री एवं वाराणसी से सांसद बनने की शपथ ली। अब यदि वह खुद संविधान की शपथ ले रहे हैं, और फिर भी संविधान की हत्या मान रहे हैं तो यह एक आश्चर्य करने वाली बात है। जैसा कि मालूम है कि चाहे कोई जीव हो या संविधान हो यदि हत्या हो जाए उसकी जान चली जाएगी।तो फिर वह दोबारा जीवित नहीं हो सकता है।
यदि संविधान की हत्या हो गई तो फिर इस संविधान से प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी ने संविधान को साक्षी मानकर की शपथ कैसे ली? हालांकि तत्कालीन दिवंगत प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने ऐसा कोई असंवैधानिक निर्णय नहीं लिया था। जिससे यह कहा जा सके के संविधान के नियमों के विपरीत था। क्योंकि तत्कालीन प्रधानमंत्री दिवंगत श्रीमती इंदिरा गांधी ने अपनी कैबिनेट मंत्रिमंडल की बैठक बुलाई थी। कैबिनेट की बैठक में ही अनुच्छेद 352 के तहत देश में आपातकाल लगाने का निर्णय कैबिनेट ने लिया था। कैबिनेट के इस निर्णय से तत्कालीन भारत के राष्ट्रपति दिवंगत फखरुद्दीन अली अहमद को अवगत कराया था। कैबिनेट के द्वारा लिए गए निर्णय को देश में आपातकाल लगाने की तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने उद्घोषणा की थी।
जबकि वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी कहते हैं कि तत्कालीन प्रधानमंत्री दिवंगत श्रीमती इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लगाने की घोषणा की थी। देश में अबतक तीन बार आपातकाल अर्थात इमरजेंसी लग चुकी है। *पहली बार 26 अक्टूबर 1962 से 10 जनवरी 1968 तक भारत और चीन के युद्ध के दौरान की गई* थी, जब बाहरी आक्रमणों के कारण भारतीय सुरक्षा खतरे में पड़ गई थी। दूसरी बार 3 दिसंबर से 17 दिसंबर 1971 तक भारत और पाकिस्तान के युद्ध के दौरान आपातकाल की घोषणा की गई* थी, और *तीसरी तथा अंतिम बार 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक की गई थी।
मोदी सरकार ने एक ही आपातकाल को संविधान की हत्या दिवस बताया इसलिए यह विशुद्ध राजनीतिक नफरती जैसा फैसला है। सबसे बड़ी हत्या जैसा शब्द भी बेहद अशोभनीय एवं असंवैधानिक है। विपक्षी पार्टियों को इसका जमकर विरोध करना चाहिए था। वैसे आपातकाल लगाने की अनुमति भी संविधान ही देता है। अनुच्छेद 352 राष्ट्रीय आपातकाल अधिनियम है, जिसके तहत भारत के राष्ट्रपति द्वारा कारण सहित आपातकाल की घोषणा की जाती है। हालांकि संविधान में प्रावधान होने के बावजूद आपातकाल लगाना भी एक गलत घटना होती है लेकिन किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाना भी उतना ही गलत होता है। अनुच्छेद 356 में राष्ट्रपति शासन का प्रावधान है और अबतक देश में कई बार राज्यों की सरकारों को भंग करके राष्ट्रपति शासन लगाया गया है।
जब तत्कालीन प्रधानमंत्री दिवंगत श्रीमती इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगाई थी तब हालात इसलिए ख़राब हुए थे क्योंकि इमरजेंसी से पहले विपक्ष के नेता सेना और पुलिस को खुलेआम यह संदेश दे रहे थे कि आप सरकार का कोई आदेश का पालन न करें। ऐसे में सेनाएं यदि वाकई पीछे हट जाती तो राजनीति के चक्कर में देश पर बाहरी आक्रमण हो सकता था। चीन उसकी पुरी फ़िराक में था और पाकिस्तान से तो कुछ ही दिन पहले युद्ध हुआ था। आपातकाल लगाने के पीछे यही हालात जिम्मेदार थे। फिर भी मैं मानता हूं कि आपातकाल एक गलत घटना थी लेकिन उससे भी गलत उस वक्त के विपक्षी नेता थे जो निजी स्वार्थ के लिए अराजकता का माहौल बना बैठे थे। जब आपातकाल का फैसला वापस लिया और देश में दोबारा चुनाव हुए तो जनता पार्टी की सरकार बनी और महज तीन सालों में उन्होंने राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगाया।
मोदी सरकार खुद अब तक राज्यों की सरकारों को गिरवाकर पूरे कई बार राष्ट्रपति शासन लगा चुकी है, और फैसला इसे भी गलत ही कहा जायेगा। लेकिन बात यही कि जो सत्ता में होते हैं उनके आगे लोकतन्त्र के सारे स्तंभ सब नतमस्तक रहते हैं। जनता भी अपना पक्ष स्पष्ट नहीं कर पाती और जब कई दशकों बाद उनमें विमर्श होता है तो वह विमर्श निरर्थक के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता है क्योंकि उससे कुछ हासिल नहीं हो पाता है। खैर! आपातकाल की कौन कौन सी स्थितियां होती हैं जिन्हें भारतीय राष्ट्रपति घोषित कर सकते हैं और वे हैं। जिसमें पहला है राज्य आपातकाल (अनुच्छेद 356) जो कि राज्यों में राष्ट्रपति शासन के रूप* में होता है। यह फैसला अक्सर राज्यों की आंतरिक सुरक्षा या राजनीतिक झगड़ों के कारण लिया जाता है। यह पूरे देशभर के राज्यों में 132 बार लगाया जा चुका है। दूसरा राष्ट्रीय आपातकाल अर्थात इमरजेंसी (अनुच्छेद 352) इसका फैसला बाहरी आक्रमण, युद्ध या सशस्त्र विद्रोह के कारण* होता है जो भारत देश के शासन, शांति, सुरक्षा और स्थिरता को खतरा पहुंचाता है तो राष्ट्रपति राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा कर सकते हैं। राष्ट्रीय आपातकाल 6 महीने की अवधि के लिए लागू होता है और यदि आवश्यक हो तो इसे 6 महीने के बाद संसद की मंजूरी से नवीनीकृत या बढ़ाया जा सकता है। यह देश में तीन बार लगाया जा चुका है।
तीसरा वित्तीय आपातकाल (अनुच्छेद 360) यह वह आपातकाल है जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 360 के तहत भारतीय राष्ट्रपति द्वारा घोषित किया जाता* है। भारत में अबतक कभी भी वित्तीय आपातकाल नहीं लगाया गया लेकिन 1991 में वित्तीय संकट जरूर आया लेकिन तत्कालीन वित्तमंत्री डॉ मनमोहन सिंह जी ने देश को उबार दिया था। आपको मालूम है कि बाद में यही वित्तमंत्री भारत के प्रधानमंत्री भी बने थे। उसके बाद प्रधानमंत्री मोदीजी द्वारा जब नोटबंदी की गई थी तब भी हालात ठीक नहीं थे और लोगों को उस वक्त एक बड़ी मुसीबत का सामना करना पड़ा था क्योंकि उसमें सरकार की तत्परता और व्यवस्था बेहद कमज़ोर थी लेकिन देश के ऊपर आजतक कभी वित्तीय आपातकाल नहीं आया। तो यह तमाम आपातकाल और उससे जुड़ी घटनाएं आपके समक्ष हैं। इसीलिए मेरा मानना है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी द्वारा *संविधान हत्या दिवस* की घोषणा करना असंवैधानिक सोच है। इससे प्रतीत होता है कि नरेन्द्र दामोदरदास मोदी खुद संविधान का दिनदहाड़े गला घोंटने का कृत्य कर रहे हैं। जो कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी द्वारा संविधान में दर्ज अनुच्छेद 352 की स्वयं अव्हेलना की है।







