लखनऊ अग्निकांड: 2016 में जारी हुआ था बिल्डिंग गिराने का आदेश, दो महीने बाद कैसे हुआ रद्द? जांच के घेरे में 30 अधिकारी

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के अलीगंज में हुए भीषण अग्निकांड में 15 लोगों की मौत के बाद अब इमारत से जुड़े पुराने रिकॉर्ड और प्रशासनिक फैसले गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं। शुरुआती जांच में खुलासा हुआ है कि जिस भवन में सोमवार को आग लगने से यह दर्दनाक हादसा हुआ, उसके खिलाफ वर्ष 2016 में अवैध निर्माण को लेकर ध्वस्तीकरण (गिराने) का आदेश जारी किया गया था। हैरानी की बात यह है कि महज दो महीने के भीतर यह आदेश रद्द भी कर दिया गया। अब जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि आखिर किस स्तर पर और किन अधिकारियों की मंजूरी से ध्वस्तीकरण आदेश को निरस्त किया गया था।
1980 में आवंटित हुई थी इमारत
सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, अलीगंज सेक्टर-डी स्थित यह भवन 11 जुलाई 1980 को लॉटरी प्रणाली के तहत विजय कुमार को हायर-परचेज योजना के अंतर्गत आवंटित किया गया था। उसी वर्ष 4 नवंबर को उन्हें भवन का कब्जा भी सौंप दिया गया। बाद में वर्ष 2005 में यह संपत्ति विजय कुमार और उनकी पत्नी उषा के नाम सेल डीड के माध्यम से दर्ज हुई। इसके बाद 19 जनवरी 2013 को दंपति ने यह भवन वीरेन्द्र प्रताप शुक्ला और सुरेन्द्र प्रताप शुक्ला को बेच दिया। करीब 1992 वर्गफुट क्षेत्रफल वाली इस इमारत का नक्शा 20 अगस्त 2014 को सेल्फ-सर्टिफिकेशन बिल्डिंग प्लान योजना के तहत आवासीय उपयोग के लिए स्वीकृत किया गया था।
अवैध निर्माण पर चला था मामला
लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) की जांच में बाद में भवन में अनधिकृत निर्माण की बात सामने आई। इसके बाद एलडीए ने वीरेन्द्र प्रताप शुक्ला के खिलाफ मुकदमा संख्या-08/2016 दर्ज कराया। मामले की सुनवाई के बाद 10 मई 2016 को सक्षम प्राधिकारी ने अवैध निर्माण को लेकर भवन ध्वस्त करने का आदेश जारी कर दिया था। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से 5 जुलाई 2016 को, यानी करीब दो महीने बाद ही, यह आदेश निरस्त कर दिया गया। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब अवैध निर्माण साबित हो चुका था, तो ध्वस्तीकरण का आदेश क्यों और किसके निर्देश पर वापस लिया गया?
30 अधिकारियों की भूमिका जांच के दायरे में
एलडीए की प्रारंभिक पड़ताल में सामने आया है कि वर्ष 2014 से 2026 के बीच इस क्षेत्र में करीब 30 अधिकारी, इंजीनियर, जोनल अधिकारी और विहित प्राधिकारी तैनात रहे। हादसे के बाद सभी संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच की जा रही है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगा रही हैं कि भवन में हुए निर्माण, उसके उपयोग और कार्रवाई से जुड़े मामलों में कहीं किसी स्तर पर लापरवाही या मिलीभगत तो नहीं हुई।
चार आरोपी गिरफ्तार
इस मामले में पुलिस ने भवन मालिकों समेत चार लोगों को गिरफ्तार किया है। गिरफ्तार आरोपियों में राम कृष्ण उपाध्याय (43), वीरेन्द्र प्रताप शुक्ला (62), तुषार कृष्ण जायसवाल (31) और सुरेश कुमार साहू शामिल हैं। फिलहाल पुलिस और प्रशासनिक टीमें हादसे के कारणों, भवन की वैधता और पूर्व में हुई कार्रवाई की पूरी जांच कर रही हैं। इस दर्दनाक अग्निकांड में 15 लोगों के साथ कई बेजुबान जानवरों की भी जान चली गई, जिसके बाद जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की मांग तेज हो गई है।







