उत्तर प्रदेशप्रदेश

कानपुर नगर निगम में करोड़ों के टेंडर घोटाले का खुलासा: नियमों की अनदेखी, ठेकेदारों को लाभ और दोयम दर्जे का काम; सीएम योगी की फटकार के बाद जांच तेज

Dr Rakesh Varma Ex IAS

कानपुर। उत्तर प्रदेश के औद्योगिक शहर कानपुर में नगर निगम के करोड़ों रुपये के टेंडरों में बड़े पैमाने पर अनियमितताओं का मामला सामने आया है। नियमों और मानकों की धज्जियां उड़ाते हुए ठेकों का आवंटन किया गया, जिससे चुनिंदा ठेकेदारों को अनुचित लाभ पहुंचाया गया। इसके अलावा इन ठेकों के तहत दोयम दर्जे के निर्माण कार्य कराए गए, जिससे शहर की सड़कें, नाले और अन्य बुनियादी सुविधाएं जर्जर हालत में पहुंच गईं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सख्त फटकार के बाद नगर निगम प्रशासन ने जांच शुरू कर दी है। जांच में न सिर्फ टेंडर प्रक्रिया बल्कि पार्षदों की ठेकेदारी संबंधी गतिविधियों की भी पड़ताल की जाएगी।

सीएम योगी की नाराजगी और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में फटकार

बीते शनिवार (22 अगस्त 2026) को बाढ़ और विकास कार्यों की समीक्षा के दौरान वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कानपुर के अधिकारियों को आड़े हाथों लिया। उन्होंने मंडलायुक्त के. विजयेन्द्र पांडियन और नगर आयुक्त अर्पित उपाध्याय से सीधे सवाल पूछे। मुख्यमंत्री ने कहा कि कानपुर नगर निगम में किसी विशेष व्यक्ति के नाम पर टैक्स कैसे चल रहा है? ठेकों में माफियागिरी, जबरन टैक्स वसूली और जर्जर सड़कों की हालत बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उन्होंने नगर विकास मंत्री ए.के. शर्मा से भी पूछा कि क्या उन्हें नगर निगम में चल रहे खेल की जानकारी है। पुलिस आयुक्त रघुबीर लाल को निर्देश दिए गए कि अवैध टैक्स वसूली में शामिल लोगों को चिन्हित कर सख्त कार्रवाई करें। मुख्यमंत्री ने साफ चेतावनी दी कि अगर तुरंत कार्रवाई नहीं हुई तो अधिकार छीने जा सकते हैं। इस फटकार के बाद पूरे नगर निगम प्रशासन में हड़कंप मच गया। मंडलायुक्त ने सड़कों का निरीक्षण शुरू किया और नगर आयुक्त ने तुरंत जांच कमेटी गठित कर दी।

टेंडरों में क्या-क्या गड़बड़ियां सामने आईं?

प्रारंभिक जांच में नगर निगम के करोड़ों रुपये के टेंडर फाइलों में गंभीर अनियमितताएं मिली हैं। कई फर्मों को तकनीकी और वित्तीय मानकों की अनदेखी करते हुए ठेके दिए गए। ई-टेंडरिंग के नियमों का पालन नहीं किया गया, चहेते ठेकेदारों को प्राथमिकता दी गई और नए ठेकेदारों की एंट्री में माफियागिरी का खेल चला। सूत्रों के अनुसार, ठेकेदारों का एक कॉकस (समूह) सक्रिय था जो हॉट मिक्स प्लांट से सड़क निर्माण जैसे कार्यों में बिड्स पहले से तय कर कमीशन के रूप में ‘टैक्स’ वसूलता था। 15वें वित्त आयोग की लगभग 300 करोड़ रुपये की राशि (सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट और वायु गुणवत्ता सुधार सहित) के आवंटन में भी पक्षपात के आरोप हैं, जहां खास पार्षदों के प्रस्तावों पर 70 प्रतिशत से अधिक काम दिए गए और राशियों को बढ़ाकर आवंटित किया गया। इन अनियमितताओं का सीधा असर काम की गुणवत्ता पर पड़ा। सड़कें जल्दी खराब हो गईं, नाले अधूरे रहे और जलभराव की समस्या बनी रही। नागरिकों की शिकायतों के बावजूद लंबे समय तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

टैक्स सिंडीकेट और पार्षदों की भूमिका

नगर निगम में ठेकेदारों से जबरन ‘टैक्स’ वसूली करने वाले सिंडीकेट के खिलाफ भी अलग से जांच चल रही है। यह सिंडीकेट ठेकों के आवंटन और भुगतान में कमीशन वसूलने का काम करता था। पिछले कुछ समय से बागी भाजपा पार्षदों (पवन गुप्ता, विकास जायसवाल आदि) ने सोशल मीडिया और ज्ञापनों के जरिए भ्रष्टाचार, ‘बंटी टैक्स’ और ठेकेदारी में हस्तक्षेप के आरोप लगाए थे, जिनसे मामला मुख्यमंत्री तक पहुंचा। जांच में पार्षदों की ठेकेदारी संबंधी गतिविधियों की भी गहन पड़ताल की जाएगी। नए ठेकेदारों के रजिस्ट्रेशन के लिए गठित तीन सदस्यीय कमेटी में महापौर द्वारा नामित पार्षद शामिल होते हैं। आरोप हैं कि इस प्रक्रिया में भी पक्षपात हुआ। जांच अधिकारी फाइलों की जांच कर रहे हैं कि किन पार्षदों या उनके करीबियों के माध्यम से ठेके दिए गए और कितना लाभ पहुंचाया गया।

जांच की प्रक्रिया और संभावित कार्रवाई

नगर आयुक्त अर्पित उपाध्याय ने पुष्टि की है कि ठेकों में गड़बड़ी की जांच के लिए कमेटी गठित कर दी गई है। टीम करोड़ों रुपये के टेंडर फाइलों की पड़ताल तेजी से कर रही है। प्रारंभिक साक्ष्य मिल चुके हैं कि मानकों को ताक पर रखकर ठेके दिए गए। जांच रिपोर्ट तैयार होने के बाद दोषी फर्मों को ब्लैकलिस्ट किया जाएगा। टैक्स सिंडीकेट से जुड़े लोगों के खिलाफ भी शासन को रिपोर्ट भेजी जाएगी और पुलिस कार्रवाई हो सकती है। भविष्य में ऐसी अनियमितताओं को रोकने के लिए व्यवस्था में बदलाव किए जाएंगे।
प्रशासनिक स्रोतों के अनुसार, मंडलायुक्त, पुलिस कमिश्नर और खुफिया विभाग—तीन स्तरों पर निगरानी बढ़ाई गई है। अवैध वसूली की गतिविधियां फिलहाल थम गई हैं।

निष्कर्ष: पारदर्शिता की दिशा में कदम

कानपुर नगर निगम का यह मामला स्थानीय निकायों में पारदर्शिता और जवाबदेही की जरूरत को रेखांकित करता है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की जीरो टॉलरेंस नीति के तहत शुरू हुई यह जांच अगर निष्पक्ष और तेज गति से पूरी हुई तो दोषियों पर सख्त कार्रवाई हो सकती है। शहरवासी उम्मीद कर रहे हैं कि जांच के बाद न सिर्फ घोटालेबाजों को सजा मिलेगी बल्कि विकास कार्यों में गुणवत्ता और पारदर्शिता भी सुनिश्चित होगी। आगे की रिपोर्ट का इंतजार है।

(समाचार स्रोतों पर आधारित; जांच जारी है।)

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