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राजनीति में भाषा का गिरता स्तर: शर्मनाक घटनाओं पर ज़रूरी सवाल

नई दिल्ली। भारतीय राजनीति में विरोध और मतभेद कोई नई बात नहीं है। लोकतंत्र का यही सौंदर्य है कि अलग-अलग विचारधाराओं के लोग अपनी बात खुलकर रखते हैं और जनता के सामने अपने-अपने एजेंडे पेश करते हैं। मगर हाल के दिनों में राजनीति का स्वरूप जिस तरह बदल रहा है, वह गंभीर चिंता का विषय है। विपक्ष का विरोध करना या किसी पार्टी की नीतियों पर सवाल उठाना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन व्यक्तिगत स्तर पर अपमानजनक भाषा का प्रयोग करना न केवल राजनीतिक संस्कृति को चोट पहुँचाता है, बल्कि पूरे समाज के लिए गलत उदाहरण स्थापित करता है।

कांग्रेस कार्यकर्ताओं का विवादित बयान

हाल ही में कांग्रेस कार्यकर्ताओं द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मां के खिलाफ आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया गया। यह घटना बेहद शर्मनाक है। राजनीति में यह नया ट्रेंड देखने को मिल रहा है कि नेताओं की नीतियों पर सवाल उठाने की बजाय उनके परिवार को निशाना बनाया जा रहा है। सवाल यह है कि क्या राजनीति इतनी निचले स्तर पर पहुंच गई है कि अब नेता और कार्यकर्ता विरोधियों की मां-बहनों को गाली देकर अपनी भड़ास निकालेंगे?

पहले कभी नहीं थी ऐसी परंपरा

अगर हम पीछे झांककर देखें तो अटल बिहारी वाजपेयी, इंदिरा गांधी, लाल बहादुर शास्त्री या यहां तक कि मनमोहन सिंह के दौर में भी नेताओं ने एक-दूसरे की नीतियों और विचारधाराओं का जमकर विरोध किया। संसद में तीखी बहसें भी हुईं, लेकिन निजी हमले करने और परिवारों को घसीटने की परंपरा कभी नहीं रही। विरोध हमेशा पार्टी और उसकी कार्यप्रणाली तक सीमित रहा।

भाषा के पतन का खतरनाक असर

आज जिस तरह से राजनीति में भाषा का स्तर गिर रहा है, उसका असर सिर्फ नेताओं तक सीमित नहीं रहेगा। यह आने वाली पीढ़ियों और पूरे समाज पर असर डालेगा। अगर कार्यकर्ता और नेता खुलेआम गाली-गलौज करेंगे, तो आम जनता भी उसी भाषा का इस्तेमाल करने लगेगी। सोशल मीडिया पर पहले से ही ट्रोलिंग और अभद्र भाषा का इस्तेमाल बढ़ चुका है। ऐसे में नेताओं का यह रवैया उस आग में घी डालने जैसा है।

क्या यह सामान्य हो जाएगा?

सबसे बड़ा खतरा यही है कि अगर इस तरह की घटनाओं पर सख्त विरोध नहीं हुआ, तो आने वाले समय में यह सब आम बात बन जाएगी। हमें रोज़ाना अखबारों और टीवी चैनलों पर ऐसे ही बयान सुनने को मिलेंगे। लोकतंत्र का यह स्वरूप किसी भी देश के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। राजनीति का उद्देश्य जनता की सेवा करना और देश को आगे बढ़ाना होना चाहिए, न कि गाली-गलौज और व्यक्तिगत हमलों के जरिए विरोध जताना।

राजनीति में मतभेद होना ज़रूरी है, लेकिन मर्यादा बनाए रखना उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है। अगर राजनीतिक दल और उनके कार्यकर्ता इस तरह की भाषा को समर्थन देंगे, तो लोकतंत्र की आत्मा कमजोर हो जाएगी। यह समय है जब सभी दलों को मिलकर तय करना चाहिए कि राजनीति में विरोध हो, लेकिन व्यक्तिगत स्तर पर किसी भी तरह की अभद्रता न हो।

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