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ब्रज की आध्यात्मिक होली: प्रेम, परंपरा और सावधानी का संदेश

ब्रज में होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं से जुड़ा एक आध्यात्मिक पर्व है। यहां की होली प्रेम, भक्ति और संस्कारों की मिसाल मानी जाती है। प्रसिद्ध कथावाचक देवकीनंदन ठाकुर ने मथुरा में कहा कि देश-विदेश से श्रद्धालु भगवान के रंग में रंगने के लिए ब्रज पहुंचते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि ब्रज की होली में शराब, मांस, जुआ और द्वेष जैसी प्रवृत्तियों का कोई स्थान नहीं है। उनके अनुसार, ऐसी गतिविधियां सनातन परंपराओं के विपरीत हैं।

उन्होंने यह भी बताया कि इस वर्ष पूर्णिमा के दिन चंद्र ग्रहण पड़ रहा है, इसलिए होली विशेष सावधानी के साथ मनाई जा रही है। सूतक काल में गर्भवती महिलाओं और छोटे बच्चों को घर में रहकर भगवान का जाप करने की सलाह दी गई है। देवकीनंदन ठाकुर अपने प्रवचनों में नशे के खिलाफ लगातार आवाज उठाते रहे हैं। उनका कहना है कि शराब और नशीले पदार्थ युवाओं के भविष्य को बर्बाद कर देते हैं, इसलिए समाज को इससे दूर रहना चाहिए।

ब्रज में प्रमुख स्थान जहां मनती है होली

ब्रज क्षेत्र के प्रमुख स्थानों में मथुरा, वृंदावन, बरसाना, नंदगांव, गोकुल, महावन और बलदेव शामिल हैं। यहां होली का उत्सव भव्य और पारंपरिक अंदाज में मनाया जाता है।

ब्रज होली की प्रमुख परंपराएं

फूलों की होली

वृंदावन के मंदिरों में फूलों की वर्षा के बीच भक्त होली मनाते हैं। यह दृश्य आध्यात्मिक और मनमोहक होता है।

लठमार होली

बरसाना और नंदगांव की लठमार होली विश्व प्रसिद्ध है, जहां महिलाएं हंसी-ठिठोली में पुरुषों पर लाठियां बरसाती हैं और पुरुष ढाल से बचाव करते हैं। गोकुल और महावन में छड़ी मार होली और हुरंगा का आयोजन होता है।

होलिका दहन और धुलेंडी

पूर्णिमा की रात होलिका दहन किया जाता है। इस बार चंद्र ग्रहण के कारण विशेष सावधानी बरती जाएगी। 4 मार्च को रंगवाली होली, यानी धुलेंडी खेली जाएगी। ब्रज में होली का उत्सव बसंत पंचमी से शुरू होकर लगभग 40 दिनों तक चलता है। जहां देशभर में 4 मार्च को होली मनाई जाएगी, वहीं ब्रज में यह उत्सव मार्च के दूसरे सप्ताह तक जारी रहेगा। ब्रज की होली भक्ति, संस्कृति और सनातन परंपराओं का जीवंत प्रतीक है।

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