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गैर मान्यता प्राप्त मदरसों को बंद नहीं किया जा सकता, इलाहाबाद हाई कोर्ट की अहम टिप्पणी

लखनऊ: गैर-मान्यता प्राप्त मदरसों को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य के कानून के तहत केवल मान्यता न होने के आधार पर किसी मदरसे को बंद नहीं किया जा सकता। खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश गैर-सरकारी अरबी और फारसी मदरसा मान्यता, प्रशासन और सेवा विनियमन, 2016 का हवाला देते हुए यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने राज्य सरकार के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके तहत श्रावस्ती जिले के एक मदरसे को बिना मान्यता के संचालन के कारण बंद करने के लिए कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था। यह आदेश 16 जनवरी को पारित हुआ था, जो मंगलवार को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हुआ।

इस फैसले में श्रावस्ती जिले के मदरसा अहले सुन्नत इमाम अहमद रजा को बड़ी राहत मिली है। न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी की खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा कि 2016 के मदरसा विनियमन में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जो प्रशासन को गैर-मान्यता प्राप्त मदरसों को संचालित होने से रोकने का अधिकार देता हो। कोर्ट ने यह भी बताया कि जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी द्वारा 1 मई 2025 को जारी किया गया कारण बताओ नोटिस कानूनन गलत था। इसे निरस्त करते हुए अदालत ने मदरसे पर लगाई गई सील 24 घंटे के भीतर हटाने का निर्देश दिया।

हालांकि, कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि जब तक मदरसे को आधिकारिक मान्यता नहीं मिल जाती, तब तक वह किसी भी प्रकार के सरकारी अनुदान का दावा नहीं कर सकेगा। साथ ही मदरसा शिक्षा बोर्ड इस मदरसे के छात्रों को अपनी परीक्षाओं में बैठने की अनुमति देने के लिए बाध्य नहीं होगा।कोर्ट ने यह भी कहा कि इस मदरसे से पढ़ाई करने वाले छात्र अपनी योग्यता या डिग्री का उपयोग सरकारी नौकरी या किसी अन्य सरकारी उद्देश्य के लिए नहीं कर सकेंगे, जब तक मदरसा मान्यता प्राप्त नहीं हो जाता। इस फैसले को मदरसों से जुड़े कानूनों की व्याख्या के लिहाज से अहम माना जा रहा है।

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