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बांग्लादेश में हिंसा का बढ़ता साया: हिंदू युवकों की हत्याएं, चुनाव और सत्ता पर सवाल

बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही है। दीपू चंद्र दास की हत्या के बाद अब राजबाड़ी जिले से एक और दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है, जहां 29 वर्षीय अमृत मंडल उर्फ सम्राट को भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला। यह घटना उस समय हुई, जब देश में पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के बेटे और बीएनपी नेता तारिक रहमान की वापसी को लेकर जश्न मनाया जा रहा था।

इन लगातार हो रही हत्याओं के बाद बांग्लादेश में राजनीतिक और सामाजिक हालात पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। अल्पसंख्यक हिंदुओं पर बढ़ते हमलों और भारत विरोधी माहौल के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि देश को हिंसा की आग में झोंककर मौजूदा यूनुस सरकार आखिर क्या हासिल करना चाहती है। सवाल यह भी है कि बांग्लादेश की दिशा अब किस ओर जा रही है।

युवा नेता और इंकलाब मंच के प्रवक्ता शरीफ उस्मान हादी की हत्या के बाद देशभर में भड़के विरोध प्रदर्शनों ने हालात और बिगाड़ दिए हैं। इन घटनाओं के बाद बांग्लादेश में यह आवाज उठने लगी है कि बढ़ती हिंसा किसी साजिश का हिस्सा हो सकती है, जिसका मकसद आगामी आम चुनाव को रद्द या टालना है। आरोप लग रहे हैं कि मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली सरकार किसी भी कीमत पर चुनाव टालना चाहती है।

ऐसे समय में तारिक रहमान की वापसी को बांग्लादेश के लिए एक निर्णायक मोड़ माना जा रहा है। यह भारत की क्षेत्रीय सुरक्षा के लिहाज से भी अहम है। दिल्ली की नजर इस घटनाक्रम पर टिकी हुई है, क्योंकि रहमान की सक्रिय राजनीति में वापसी न सिर्फ बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति, बल्कि भारत-बांग्लादेश संबंधों के लिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। यह सब उस वक्त हो रहा है, जब अवामी लीग को चुनाव लड़ने से रोका गया है, शेख हसीना भारत में शरण लिए हुए हैं और बीएनपी प्रमुख खालिदा जिया गंभीर बीमारी के चलते अस्पताल में भर्ती हैं।

भारत और बीएनपी के रिश्ते अतीत में तनावपूर्ण रहे हैं, लेकिन हाल के दिनों में सुधार के संकेत मिले हैं। 1 दिसंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खालिदा जिया की बीमारी पर चिंता जताते हुए मदद की पेशकश की थी, जिस पर बीएनपी ने आभार जताया। वहीं तारिक रहमान यूनुस सरकार के आलोचक रहे हैं और उन्होंने जमात के साथ गठबंधन से इनकार किया है। उन्होंने ‘बांग्लादेश फर्स्ट’ की नीति की बात करते हुए साफ किया है कि वे कट्टरपंथ के खिलाफ हैं।

हाल ही में दिए एक बयान में तारिक रहमान ने कहा था, “न दिल्ली, न पिंडी, पहले बांग्लादेश।” इसे उनकी संतुलित विदेश नीति की ओर संकेत माना जा रहा है। हालांकि भारत को लेकर उनके रुख में सतर्कता है, लेकिन कट्टरपंथ से दूरी भारत के लिए एक सकारात्मक संकेत मानी जा रही है। यदि बीएनपी सत्ता में आती है, तो बांग्लादेश की विदेश नीति में बदलाव की संभावना जताई जा रही है, जो मौजूदा हालात में भारत के हितों के अनुकूल हो सकती है।

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