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संवेदना की रईसी: क्यों आज भी प्रासंगिक हैं राज कपूर

श्रीधर अग्निहोत्री

राज कपूर—यह नाम मात्र एक अभिनेता या निर्देशक का नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा की आत्मा का पर्याय है। उनकी जयंती पर उन्हें स्मरण करना उस कलाकार को प्रणाम करना है, जिसने परदे पर गरीबी को केवल दिखाया नहीं, बल्कि उसे जिया; और निजी जीवन में शोहरत व संपन्नता के बीच रहते हुए भी मन से हमेशा आम आदमी बना रहा।

राज कपूर की फिल्मों का नायक रेशमी कपड़ों में सजा-संवरा राजकुमार नहीं था। वह फटे जूतों में चलने वाला, सपने आंखों में और दर्द होठों पर लिए एक साधारण इंसान था। ‘आवारा’, ‘श्री 420’, ‘जागते रहो’ और ‘मेरा नाम जोकर’। इन सभी में उनका पात्र समाज के हाशिए पर खड़े उस मनुष्य का प्रतिनिधि है, जो अभावों से घिरा है, पर आत्मसम्मान से समृद्ध है। राज कपूर ने गरीबी को दया का विषय नहीं बनाया, बल्कि उसे मानवीय गरिमा और संवेदना से जोड़ा।

उनका ‘आवारा’ दुनिया भर में इसलिए समझा गया, क्योंकि उसकी पीड़ा सार्वभौमिक थी। जब वे कहते हैं—“आवारा हूं”—तो वह एक व्यक्ति का गीत नहीं, बल्कि व्यवस्था से जूझते करोड़ों लोगों की आवाज़ बन जाता है। राज कपूर के कैमरे में झोपड़ी भी कविता बन जाती थी और सड़क पर सोता मजदूर भी नायक।

विडंबना यह है कि राज कपूर स्वयं एक समृद्ध फिल्म परिवार से आए, लेकिन उनके सिनेमा का हृदय सदैव गरीब के साथ धड़कता रहा। यही उनकी रईसी थी, संवेदना की रईसी, विचारों की रईसी और साहस की रईसी। उन्होंने दिखाया कि सच्चा कलाकार वही है, जो अपनी सुविधा छोड़कर समाज की सच्चाई को अपनाए।

राज कपूर आज भी प्रासंगिक हैं, क्योंकि गरीबी आज भी हमारे बीच है और उसे समझने वाली दृष्टि दुर्लभ। उनकी जयंती पर यही स्मरण पर्याप्त है कि उन्होंने सिखाया, गरीब होना अभिशाप नहीं, और गरीब को समझ पाना ही सच्ची अमीरी है।

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